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काम वाली लघु कथा

  −−−−−−−−−−−−−−− पत्नी मैके गई थी। काम वाली घर की सफाई करने के दौरान स्टोर में ग ई । मोहन ने पीछे   से जाकर उसकी कौली भर ली। काम वाली   हाथ से झाडू फेंक शांत खड़ी हो गई। कोई उत्तर नहीं।कोई प्रतिरोध नहीं।निशब्द, निश्चल। मूर्ति सी। मोहन ने कहा− क्या हुआ।न कुछ बोलती हो,न विरोध करती हो। उसने कहा− बाबू गरीब हूँ।क्या   विरोध करूं। कौन सुनेगा।सुनेगा तो फिर   काम पर कौन रखेगा। सभी जगह एक ही हाल है। फिर क्या विरोध, किसका विरोध। मोहन का बांहपाश   उसकी कमर से अपने आप ढीला पड़ गया।वह हारा सा, पराजित सा, स्टोर से बाहर सोफे पर आकर बैठ गया। अखबार उठाकर उसे पढ़ने की कोशिश करने लगा।काम वाली अपने काम में लग गई।

एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो

    एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो मित्र जागो   तुम उदास हो , रो रही हो , तुमने पति खोया है। वक्त ने तुम्हारे जीवन में विष बीज बोया है। जीवन पथ पर तुम्हें सहारा देने वाले , अब वो मजबूत हाथ   नहीं रहे । 45 साल साथ साथ   चलने वाले   अब वह तुम्हारे साथ नहीं रहे। अब तुम अकेली हो , परेशान हो , उनको याद कर अपना   आपा खो देती हो , बात बात पर जब -तब रो देती हो , तुम्हारी पीड़ा को वही जान सकता है , जिसका जीवन संबल गया हो , सहारा   खोया हो , होठों की   मुस्कान गई हो , मांग का   ‌सिंदूर छिना हो , जीवन का हीरों गया हो , जो जार जार रोया हो , जिसने जीवन   का संबल खोया हो । एक बात बताओ , क्या ऐसा पृथ्ची पर पहली बार हुआ है , क्या इससे   पहले लोगों ने जीवन साथी अपने ‌प्र‌िय को नहीं गवांया। क्या यह दुख तुम पर ही पहली बार आया । तुम पर यह दुख आया ,  तुम रो रही हो , उदास हो , जीवन से निराश हो। किंतु यहां तो कोई भी अमर नहीं है , जो आया है , उसे जाना है , जाकर फिर नए रूप में   ...

चातक को आस

    चातक को रहती सदा , एक बूँद की आस। सागर से भी बड़ी है , इस मानव की प्यास। अशोक मधुप ना कोई महफ़िल जमें , ना कोई घर आय ग़ालिब टाइम पास को , रहे बटेर लड़ाय। --5 तुम आये हो खोजने , प्यार , नेह की छाॅव। अब तो पहले से नहीं , सखे ! रहे ये गाॅव। -5, वृक्ष लगाने पर नहीं , आज मनुज का ध्यान। वट - मावस को   तोड़ते , पूजित वटको मान। - ना तेरा कुछ दोष है , ना मेरा कुछ दोष।धन - वैभव में डूबके , सब ही थे मदहोश। - अब तो घर मे बंद हैं , क्या प्रातः   , क्या रात।इस आफत से बचे तो , करें चाँद की बात। --- ना कोरोना की खता , ना है कोई पाप। अपने अपने भाग्य की , रहे डगर सब नाप। --- ना कोई अधिकार है , ना कोई अनुबंध। सुबह - शाम जैसा सखे ! अनबांधा सम्बंध। -- वो तो जाने के लिये , निकले थे निज गेह।हुई थकन   , बिखरी सखे , पटरी पर ही देह। - ख्वाब कुछ पलक से उतरकर चले गए।कुछ दोस्त मेरी जेब कुतरकर चले गए।पूरा था लॉक डाउन , सब ट्रेन , प्लेन बन्द , कोई बताये कैसे , वो ...

एक लडकी

          एक लड़की एक दिन     मेरे  पास आई     अपनी डायरी देकर         उसमें लिखी कविताओं         की समीक्षा करने का         अनुरोध किया ।       यहां दिन भर         इधर −उधर की         खबरें     ,       अपने अखबारी         काम से ही         फुरसत नहीं       इसने एक नया         बोझा और सिंर       पर लाकर धर दिया।       इस लड़की ने       एक नही अनेक         कवितांए लिखी हैं     लिख - लिखकर पूरा     पोथा भर दिया।       जो कुछ मन में आया     ,       वही सब कविता के नाम पर     डायरी में धर दिया।  ...