काम वाली लघु कथा

 


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पत्नी मैके गई थी। काम वाली घर की सफाई करने के दौरान स्टोर में ग। मोहन ने पीछे  से जाकर उसकी कौली भर ली। काम वाली  हाथ से झाडू फेंक शांत खड़ी हो गई। कोई उत्तर नहीं।कोई प्रतिरोध नहीं।निशब्द, निश्चल। मूर्ति सी। मोहन ने कहा− क्या हुआ।न कुछ बोलती हो,न विरोध करती हो।

उसने कहा− बाबू गरीब हूँ।क्या  विरोध करूं। कौन सुनेगा।सुनेगा तो फिर  काम पर कौन रखेगा। सभी जगह एक ही हाल है। फिर क्या विरोध, किसका विरोध।

मोहन का बांहपाश  उसकी कमर से अपने आप ढीला पड़ गया।वह हारा सा, पराजित सा, स्टोर से बाहर सोफे पर आकर बैठ गया। अखबार उठाकर उसे पढ़ने की कोशिश करने लगा।काम वाली अपने काम में लग गई।

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