चातक को आस

 

 

चातक को रहती सदा, एक बूँद की आस।

सागर से भी बड़ी है,

इस मानव की प्यास।

अशोक मधुप

ना कोई महफ़िल जमें, ना कोई घर आय

ग़ालिब टाइम पास को,रहे बटेर लड़ाय।

--5तुम आये हो खोजने, प्यार, नेह की छाॅव।

अब तो पहले से नहीं,सखे! रहे ये गाॅव।

-5,वृक्ष लगाने पर नहीं, आज मनुज का ध्यान।

वट- मावस को  तोड़ते, पूजित वटको मान।-ना तेरा कुछ दोष है,ना मेरा कुछ दोष।धन- वैभव में डूबके,सब ही थे मदहोश।-अब तो घर मे बंद हैं,क्या प्रातः  ,क्या रात।इस आफत से बचे तो,करें चाँद की बात।

---ना कोरोना की खता, ना है कोई पाप।

अपने अपने भाग्य की,रहे डगर सब नाप।

---ना कोई अधिकार है, ना कोई अनुबंध।

सुबह -शाम जैसा सखे! अनबांधा सम्बंध।--वो तो जाने के लिये,निकले थे निज गेह।हुई थकन  ,बिखरी सखे,पटरी पर ही देह।-ख्वाब कुछ पलक से उतरकर चले गए।कुछ दोस्त मेरी जेब कुतरकर चले गए।पूरा था लॉक डाउन,सब ट्रेन ,प्लेन बन्द,कोई बताये कैसे,वो अपने घर चले गए।--नहीं सरल हालात हैं,नहीं सरल है साज।जीवन उलझा सा लगे,

जुल्फों जैसा आज।

--रात बिताई जाग के,दिवस बिताया सोय।

कोरोना का दौर है,उलटा सीधा होय।

-5

ना मौसम को दोष दो,ये कुदरत का काम।

वैसे ही सुख मानिए,जैसे राखे राम।

अशोक मधुप


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