एक लडकी
एक लड़की एक दिन
मेरे पास आई
अपनी डायरी देकर
उसमें लिखी कविताओं
की समीक्षा करने का
अनुरोध किया ।
यहां दिन भर
इधर −उधर की
खबरें ,
अपने अखबारी
काम से ही
फुरसत नहीं
इसने एक नया
बोझा और सिंर
पर लाकर धर दिया।
इस लड़की ने
एक नही अनेक
कवितांए लिखी हैं
लिख-लिखकर पूरा
पोथा भर दिया।
जो कुछ मन में आया ,
वही सब कविता के नाम पर
डायरी में धर दिया।
उसे कुछ नही पता ,
कविता क्या है ? कौन है ?
प्रश्न करने पर
रह जाती मौन है।
पर कविता तो कविता है।
किसी की भी हो सकती है।
किसी भी बीहड़
या रेगिस्तान में
प्यार के बीज वो सकती है।
मेरी कविता तो
एक सामान्य , पतली
खूबसूरत फीचर की
छरहरी सी एक
स्कूल टीचर है ।
बच्चों को पढ़ाती है ,
उन्हें खूब प्यार करती
दुलराती है।
पर साथ की टीचर से
किसी न किसी बात पर
दिन में एक दो बार रोज
झगड़ जाती है।
जब भी कोई मौका मिलता
बिना चूके लड़ जाती है।
कविता तो कविता है ,
मुसकाए तो फूल झड़े ,
और नाराज हो तो
खूब लड़े।
किसी पर मेहरबान हो
तो सब कुछ लुटा दे ,
और बिगड़ जाए तो
आसमान सर पर उठा दे।
जो भी स्कूल से कार्य मिलता
सहर्ष करती है।
बस एक बात गलत है ,
शादीशुदा होते भी
एक मुस्लिम लड़के पर
मरती है।
जाने क्या बात है
उसे देखकर
दीवानी सी हो जाती है ,
उसकी हल्की नीली
झील सी आखों में
खो जाती हैं ।
वैसे कविता बहुत प्यारी है
प्रसाद की कामायनी सी,
जायसी की पद्यावत सी,
श्याम की मीरा सी,
नीलम से कीमती हीरा सी,
दुष्यंत की श्ंकुलता सी
बिहारी के दोहे सी,
बहुत ही अच्छी है वह,
उसका पति भी बहुत अच्छा है।
लंबी चौड़ी देह,गठा शरीर,
अच्छा व्यक्तित्व,
जिसके भी सामने आ जाए।
उसी को भा जाए।
पूरा पूर्ण पुरूष जैसा,
कविता को प्यार भी
बहुत करता है वो,
वही करता वह कहती है जैसा।
इतना सब होते भी
फिर ऐसा क्या है
उस युवा में
क्यों चली जाती है
उसके साथ,
समझ में कभी नही आई
यह बात।
हो सकता है द्रोपदी की
एक मात्र चाहत
शायद अर्जुन ही हो
सामाजिक मयार्दाओं के कारण
भले ही उसे रहना पड़े
युधिष्ठिर या किसी
अन्य पति के साथ।
कविता तो कविता है
तेरीया मेरी नही है,
कविता वैसे भी
किसी की चेरी नहीं है।
चेरी होती तो,
कुत्ते घास खाने लगे तो
हर कोई पाल ले
की कहावत
कभी न आती।
इस लड़की जैसे लिखाड़ियों
की कविता
रहस्यवाद या छायावाद नही
तो आधुनिक कविता जरूर बन जाती।
कविता और प्रतिभा तो
ईश्वर प्रदत्त है।
वह सिर चढ़ती है
तो कबीर की बानी को
धन्य कर देती है।
तुलसी की लेखनी में
जीवन का मर्म भर
देती है।
पढ़कर केशव साहित्य
रचता तो है,पर कठिन काव्य
का प्रेत कहलाता है।
रस और माधुर्य तो
बिहारी के दोहों में
नजर आता है।
कविता तो उपमा
से कालिदास को धन्य
कर देती है।
ओज छत्रसाल जगनीक और
श्याम नारायण पांडेय
की वाणाी में भर देती है ।
कविता तो प्रतिभा है
तेरी या मेरी नहीं है,
ईश्वर प्रदत्त है
किसी की चेरी नहीं हैँ।
−अशोक मधुप
मर्जी ईश्वर की हमें,
करती है हैरान।
गेहूं पकते ही सदा,
क्यों आता तूफान?
-अशोक मधुप ·
इसठंड के मौसम में ,
ज्यादादोस्तो नही अच्छी।
तुमअपनी रजाई में मस्त रहो ,
मैंअपने बिस्तर में खुश रहूँ।
ठंडरहे या गर्म हो ,
नहींरुक रहे काम ,
वक्तनहीं रुकता कभी ,
सुबहरहे या शाम।
अशोकमधुप
दोरोटी ही चाहिये ,
बाकीसब बेकार।
इतनामिल ही जाएगा , क्याचिंता है यार।
दोरोटी ही चाहिये ,
सबजोड़ा बेकार।
इतनामिल ही जाएगा , क्योचिंता है यार।
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