अशोक मधुप के दोहे

 

अशोक  मधुप के दोहे  


मौला !कैसी है करी ?ये दिल के दरम्यान,

धीरे -धीरे मन बॅटे, अब बॅट गए मकान।

2

−चश्मा भी लो सज गया, उड़े चाँद से बाल।

 देखो बढ़ती उम्र ने ,क्या क्या किया कमाल।

3

−रात बिताई जाग के,दिवस बिताया सोय।

कोरोना का दौर है,उलटा सीधा होय।

4

−आते जाते ही रहे, बड़े-बड़े तूफान ।

पर इन पर जीता सदा,एक फकत इंसान।

5

हारेगी यह आपदा ,जीतेगा संसार।

थोड़ा सा आराम कर ,घर में ही रह यार

 

6−समझ न आवे अब सखे!,क्यों ऐसे हालात?

सोते-सोते दिन कटे,जागे कटती रात।

7−ना तन में ताकत रही,ना  अब बल है पांव।

कैसे आते फिर सखे! हम यौवन के गांव।


8-रहें कहीं भी शहर में,या महलों की छाँव।

भूल कभी पाए नहीं,अपना घर औ गाँव।

9−होली के हालात हैं ,घर में बैठो मीत।

कोरोना के खौफ में,दूर- दूर से प्रीत।

10,प्रेम प्यार में जो पंगा, बना कबीरा सूर।

जहर पान करते रहे ,मीरा ओ मंसूर। 

11-: कैसे फिर से रास हो,अब यमुना के तीर,

ना अब वो गोपी रहीं,ना यमुना का नीर।

 

12,अर्थ बहुत चिंतित भए,शब्द रहे हैं रोय।

मतलब के संसार में,कैसे रिश्ते बोय?

13− जीवन बहता जा रहा, बन नदिया की धार ।

जाने कब सागर मिले ,कब हो नौका पार?

14− कैसी -कैसी बातें हैं,कैसे -कैसे शोर।

चोर बताने में जुटे,अब दूजे को चोर।

15- कल आयी थी आपदा ,हमे डराने मीत।

सबने सीना तान के,पायी उसपर जीत!

16−रातों- रातों जागता ,कैसा है संजोग ?

क्या मुझको भी लग गया,प्रेम प्यार का रोग ?

17−कतरा- कतरा दिन कटे, पल-पल घटती रात ।

−जीवन वटके झर रहे ,एक -एक कर पात।

18−शब्दों में बॅधते नहीं, जीवन के अनुबंध।

अतुकांत अच्छे  लगें ,कुछ रिश्तों के छन्द।

19− जो बीता बीता सखे,बीतेगा हर रोज।

इसकी  चिंता छोड़ तू,रोज मना बस मौज।

प्रेम पाश से भी बड़ा,मोहपाश का रोग।

वो कुछ पल का रोग है,ये जीवन का रोग।20

नया साल शुभ हो शुभे, शुभ हों सारे काम।

खूब तुम्हे ख्याति मिले, जग में होवे नाम। 21

नया साल जब आएगा , देखेंगे उस ठौर।

अभी अभी है तो सखे, इसी साल का दौर।22

ना मन का संबंध है, ना दुख सुख के यार,

फेसबुकी संबंध है, फेसबुकी बस प्यार। 23

−सब योद्धा कुरुक्षेत्र के,सबके अपने स्वार्थ।

न ही देश का  लाभ है,ना जग का परमार्थ। 24

ऐसे कैसे बात हो ?कैसे होवे प्रीत ?

तुम बच्चों में मस्त हो ,हम बच्चों में मीत। 25

−ना हमने गीता पढ़ी,नाही वेद,कुरान ।

हमने तो जाना सखे, मानव धर्म महान। 26

मनमें रख विश्वास को,शबरी सा कर ध्यान।

श्रद्धा गर पक्की रही, आएंगे भगवान। 27

 

: मन ने तो चाहा मिलें, खुशियों के त्योहार।

पर कुदरत देती सदा ,कुछ पल हमें उधार।28

 

मौसम तो लाया सखे , अब ऐसी बरसात।

घर भी टपका रात में,ऑफिस टपका रात।29

 

 बढ़ी उम्र तो बढ़ गये, कितने वाद -विवाद।

अपने तक बचने लगे,कैसे हो संवाद ?30

: बादल थोड़ा रूंठता, मचता सूखा शोर।

करी ज्यादा मेहर तो,डूबी बस्ती, ठौर। 31

- वो जीवन की धूप थी, ये जीवन की छांव।

धूप -छाॅव के भॅवर में,डोल रही है नाव।32

: जीवन के इस सफर में, क्या क्या छूटा मीत!

कहीं छुटे हैं सपन तो, कहीं छुटे हैं गीत।33

मन्दिर- मस्जिद पर सखे!,अब ना हो तकरार।

ये तो घर हैं ईश के,शीश नवाओ यार।34

 

: जीवन को गंगा करो,करो लोक उद्धार।

दो दिन की ये जिंदगी,सुख बांटो संसार।  35

: सावन तो लो चल दिया, आयी ना बरसात।

दिनकर तपता दिन सखे!चंदा तपता  रात। 36

: ना कोई महफ़िल जमें, ना कोई घर आय

ग़ालिब टाइम पास को,रहे बटेर लड़ाय। 37

तीन तीन दल साथ थे ,फिर भी डूबी नाव।

मोदी जी की लहर में  ,हारे बड़े  चुनाव। 38

इन नयनों ने सपन को,दी जब नयी उड़ान।

दोस्त छतों पर आ गये, लेकर तीर- कमान। 39

:दुनिया चलती जा रही, पहले जैसी चाल ।

तूफानों,षडयंत्र का, करती नहीं मलाल ।40

 

थोड़े -थोड़े दिन झरे ,थोड़े- थोड़े पात।

वक्त दौड़ता जा रहा,फैला दोनों हाथ। 41

विमान  दुर्घटना पर

बच जाते गर सफर पे,निकले हीरे -लाल।

प्लेन फिसलने का सखे!होता नहीं मलाल। 42

 हीरे – लाल – बच्चों के नाम

जान आपदा की घड़ी, मत होना बेचैन।

बुरे वक्त में भी सखे!लग जाते हैं नैन। 43

: मनवा तो बांधे रहा,जाने क्या -क्या आस?

तिल तिल कर ढलती रही,जीवन की हर सांस। 44

: फेसबुकी तो लाख हैं,पर ना मन का मीत।

जो जीवन  रोशन करे,दिलवाए हर जीत। 45

'राजनीति' षडयंत्र का,ही है दूजा नाम ।

इससे ना कान्हा बचे,ना बच पाए राम। 46

सारे तीर्थ  बंद हुए ,बंद प्रभु के द्वार।

तू घर में ही नाम  ले,क्यों जाता हरिद्वार। 47

: महाकाल तो भक्त के ,दाता, कृपानिधान।

 दुष्टों को मिलता नहीं,उनसे जीवन दान। 48

: सूरज को क्यों दोष दें ? ये तो उसका काम।

खुद जलकर भी बांटता,जीवन सुबहो शाम। 49

 

 बड़े बड़े योद्धा सभी,हुए एक दिन मौन।

जीवन की गहराइयाँ,नाप सका है कौन? 50

: वर्षा तो आयी नहीं,पर बदरा हैं आज।

राजतंत्र बदला सखे! भागा गर्मी राज।51

: मानसून जी आ गए, आयी ना बरसात।।

धरती सूखी पड़ी है,झुलसे मन औ गात।52

 

: जाने कल क्या बात थी,क्यों था मन बेचैन।

सोते भी जगते रहे ,मेरे अपने नैन। 53

धोखा  देते जो सदा, कैसे करे यकीन?

एक हमारा भाई है,एक दोस्त है चीन। 54

: गगन चूम गर्मी रही, ,धरा चूमती छांव।

पीड़ित इससे सभी हैं, नगर ,मुहल्ले ,गांव। 55

 

गर्मी बैठी गगन में,रही धरा को घूर।

धरती ऐसे तप रही,ज्यों तपता तंदूर। 56

वक्त बदलता है सदा,उल्टी रस्मे रीति।

तुम भी अब बदलो सखे,शांति अहिंसा नीति। 57

: हमने कोशिश की बड़ी,सुधरें रिश्ते यार!

हिम्मत रिपु की बढ़ रही,अब तो हो संहार । 58

: झेली जाती अब  नहीं, रोज -रोज की रार।

जो भी होना है सखे,हो जाये इस बार। 59

-रिश्तों को जीते रहे, हम मनसे श्रीमान।

तुमने खोजा प्यार में,नफा और नुकसान। 60

बोलचाल ही बन्द है,प्यार मोहब्बत नाहि।

बांह पकड़कर मीत की,ले आओ घर माहि। 61

 

 

मंदिर निर्माण के बारे में कोर्ट के आदेश पर

−आयी है लो शुभ घड़ी,गाओ मंगलगान ।

मन्दिर बनने जा रहा, भली करें भगवान ।62

 

 

 हिंदी दिवस की शुभकामनाएं-

हिंदी का उत्थान जो, है करने का ध्यान।

रोजगार से जोड़िए, हिंदी को श्रीमान।63

 

71वें जन्म दिवस पर

अशोक मधुप ने देखिये, मारा छक्का आज।

बिन सठियाये हो गये,सत्तर के महाराज। 64

 

: मित्र दिवस की बातें ,किस्से, सब बेकारां हैं।

रोज मनेंगे मित्र दिवस,ये जब तक यारां हैं।65

भूख सदा जीती यहां,हारा सब संसार।

डरे भूख से ,खुल गये,मन्दिर-मॉल बाजार।66

: जैसे -जैसे बढ़ रही,जीवन की रफ्तार।

वैसे-वैसे बढ़ रहे,केस करोना यार।67

: ना कोई महफ़िल जमें, ना कोई घर आय

ग़ालिब टाइम पास को,रहे बटेर लड़ाय।67

तुम आये हो खोजने, प्यार, नेह की छाॅव।

अब तो पहले से नहीं,सखे! रहे ये गाॅव।68

: वृक्ष लगाने पर नहीं, आज मनुज का ध्यान।

वट- मावस को  तोड़ते, पूजित वटको मान।69

: ना तेरा कुछ दोष है,ना मेरा कुछ दोष।

धन- वैभव में डूबके,सब ही थे मदहोश।70

-अब तो घर मे बंद हैं,क्या प्रातः  ,क्या रात।

इस आफत से बचे तो,करें चाँद की बात।71

ना कोरोना की खता, ना है कोई पाप।

अपने अपने भाग्य की,रहे डगर सब नाप। 72

ना कोई अधिकार है, ना कोई अनुबंध।

सुबह -शाम जैसा सखे! अनबांधा सम्बंध।73

- चातक को रहती सदा, एक बूँद की आस।

सागर से भी बड़ी है,इस मानव की प्यास।75

 

 नहीं सरल हालात हैं,नहीं सरल है साज।

जीवन उलझा सा लगे,जुल्फों जैसा आज।76

कोरोना  पर दोहे

रात बिताई जाग के,दिवस बिताया सोय।

कोरोना का दौर है,उलटा सीधा होय।77

: ना मौसम को दोष दो,ये कुदरत का काम।

वैसे ही सुख मानिए,जैसे राखे राम।78

कोरोना में बैठके, घर में ही कर ध्यान।

घर बैठे घटती नहीं, मानव ! तेरी शान ।79

कभी घूमने का सखे ,जग में था आनन्द।

अब अच्छा लगता हमें,रहना घर में बन्द।80

श्रमिको के लाक डाउन के समय घार लौटते ट्रेन से कटने पर

−वो तो जाने के लिये,निकले थे निज गेह।

हुई थकन  ,बिखरी सखे,पटरी पर ही देह। 81

−जंग बड़ी है मीत ये,सब घर में हैं बंद ।

यहीं बैठ कर तुम रचो, कविता, दोहे ,छंद ।82

दुनिया का आतंक है, यह कोरोना रूप।

इसके आगे काॅपते , बड़े- बड़े नर ,भूप।83

बड़े -बड़े नर ,भूप, घरों में बंद हो गए।

सारे कारोबार ,आज लो मंद हो गए ।84

सारे हैं लाचार , ट्रंप, रानी या  मुनिया।

इसके आगे जूझ ,रही है सारी दुनिया ।85

वह मंजर कुछ और था, ये मंजर कुछ और।

अब तो पत्नी संग ही, लगे सुहाना ठौर।96

इच्छाएं सीमित करो , रहो घरों में मीत!

आशा राह दिखा रही,जाएॅगे हम जीत। 97

एक साथ लो जल गये, दीप करोड़ों यार !

दुनिया को दिखला दिया, अपना एका, प्यार।98

: जो भी आवे है सखे ,करे द्वार से बात।

अंदर आवत डरत वो, मैं भी बाहर जात।99

कोरोना के ख़ौफ़ ने, छीना है मन -चैन ।

अब तो घर में बीतता, पूरा दिन औ रैन।100

 

101: कोरोना के ख़ौफ़ से,बुद्धि हो गयी मंद।

तू भी घर में बंद है,मैं भी घर में बंद।101

 ना ये तेरी जंग है, ना ही मेरी जंग।

कोरोना से जंग में , दुनिया सारी संग।102

: हमने झेले हैं सखे!,बड़े बड़े संत्रास।

जीतेंगे यह जंग भी,रच देंगे इतिहास ।103

कोरोना से जंग को, ऐसे हैं तैयार।

घर में बैठे हैं सखे!,बंद सभी के द्वार।104

सड़कें सूनी हैं सखे!गलियां भी हैं मौन ।

कोरोना के कहर में ,घर से निकले कौन ?105

मीत करोना कहर हो,या कुदरत की मार।

मानव जीता जंग है,इनसे बारम्बार।106

 

कोरोना पर कुंडली

-कोरोना की जंग में, हुए सभी लाचार।

 जब तक हम सब साथ हैं,तू हिम्मत ना हार ।

तू हिम्मत ना हार,जंग जीतेंगे भैया।

हम को है विश्वास,पार होगी यह नैया।

कुछ दिन की है बात,नहीं होगा कुछ खोना।

प्रण लीन्हा है ठान, हराना है कोरोना,।।

 1

 

: बरस रहा बदरा बड़ा,शायद है बेचैन,

उगल रहा है दर्द वो, आ जाएगा चैन।

2

होली खेलो प्यार से, सखे! सभी  के संग।

करना ऐसा काम ना ,पड़े  रंग में भंग।

3−: आदर्शों पर हो गया,जब मन का अधिकार।

हमने कसमें तोड़ दीं,जाने कितनी बार।

4−चाहे दुनिया खोज ले ,टैंक, तोप,तलवार।

वाणी से घातक नहीं ,कोई भी हथियार ।

5: मैं घर पर बैठा रहा,ओढ़े कफनी गात।

समय दौड़ता चल दिया,ज्यों तरुवर के  पात।

 6−बेमौसम बारिश हुई,ओलों की बौछार।

कुदरत की नाराजगी, झेल रहा संसार।।

अशोक मधुप

7−कौन कहाँ समझा सखे,दूजे के हालात।

मन-तन ही समझे नहीं,इक दूजे की बात।

8,ना तुम हम से दूर थे ,ना हम तुम से दूर।

किसी के दिए जख्म ये,बने बड़े नासूर ।

 

9: समय अगर है साथ तो,दुनिया होगी दास।

वह सब खुद मिल जायगा,जिसकी की है आस।

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएॅ -

10भोले को हो चाहते, भोला बनजा मीत।

माया तृष्णा त्याग के, जीवन को ले जीत।

11खुदगर्जी  है गा रही,द्वेष -भाव का राग।

चंदन वन में लग गयी,लो नफरत की आग।

12: लो वसंत फिर आ गया , हमें खिलाने फाग।

तन मन को रंगने लगा,सजनी का अनुराग ।

13पुष्पों के टकरा गए,आपस में मकरंद।

तभी धरा भी गा उठी,दोहे,कविता,छन्द।

14: जीवन के कुरुक्षेत्र का, जब से देखा हाल।

रातें बैरिन  बन गयीं,मेरी सालों साल।

15,प्रेम डगर है अगन की,जल कर कुंदन होय।

राधा, मीरा, हीर की,पीड़ा समझे कोय।

16,मौसम लेकर आ गया,नए नए उपहार।

नवरात्र - आरम्भ  से ,शुरू हुए त्योहार।

17: शहरों में दिखती नहीं,रिश्तों की वह डोर।

जी चलता वापिस चलें, फिर गांवों की ओर।

18,कैसे भी हालात हों,मत घबराना मीत!

सुबह-शाम की दौड़ में,जीवन जाता बीत।

19,तुम भूले इस शहर में,पुरखों का वो गाॅव।

जिसके रस्तों पर बढ़े,मित्र! तुम्हारे पांव।

19: यादों के  जुगनू हमें, ले पहुँचे उस ठौर।

कॉलेज टाइम का अरे, जो जीवन था और।

20,एक नजर से हो गए,लाखों जीवन शाद।

कहीं नजर ने ही किया, लोगों को बरबाद।

21,नदियां तो बतला रहीं अपने तल के घाव।

ये भी तो जानो जरा,क्या खुद डूबी नाव।

22, जुगनू फैलाता सखे!, अॅधियारे में पंख।

,गहरे जाकर ही मिलें,मोती, सीपी ,शंख।

23: ना चंदा ना चाँदनी,ना ही ऐसा रूप।

,तुम तो जाड़ों की सखे! ,उजली उजली धूप।

24,तुम मेरी बदली सखे!,मैं तेरा आकाश।

दुनिया में घूमें फिरें,रहें सदा ही पास।

25: ना ही कोई मूल्य है , फिर भी है अनमोल।

गुना भाग की जिंदगी,है इतिहास भुगोल।

 

26,अब तो तुमसे क्या कहें,बीते दिन की बात।

सपनों में   जागे रहे, पूरी- पूरी रात।

26− आखर आखर खून है,शब्द हो गए गौण।

इन लाशों की ढेर पे,रह न सकोगे मौन।

27,सबसे ज्यादा खास है, मित्र! हमारी  देह।

जीवन में सबसे अधिक , करिए इस से नेह।

28परिभाषा होती नहीं, कभी" प्रीत" की मीत।

दो अक्षर के अर्थ में, जीवन जाता बीत।

29: मजदूरों के दर्द को कौन सका पहचान।

वो  जलते मरते रहे ,फैक्ट्री में श्रीमान।

30,ठंडी का मौसम सखे, बारिश है बलजोर।

बिजली की लो गर्जना,करती मन कमजोर।

31: कल कोचिंग में आग थी, अब दिल्ली में आग।

सड़कों पर यमदूत हैं,किस्से जाएं भाग।

 

32: जीवन का आनंद है ,स्नेह ,प्रीत, संगीत।

बाकी सब बेकार है, कुछ भी कह लो मीत।

33,कल बारिश थी जोर की,अब हल्की सी धूप।

ये ही जीवन के सखे,काले- उजले रूप।

34,एक प्राण फिर भी सखे!,तन-मन दोनों दूर।

तन चाहे आराम तो,मन मस्ती में चूर।

35,तुम तो कहते ही रहे,अपने मन की बात।

कभी दूसरे की सुनो, तभी निभेगा साथ।

36: न जीवन से  कुछ गिला,न जग से तकरार।

बहुत मस्त है जिंदगी,अपनी तो बस यार।

37, ठंडा है मौसम बड़ा,ठंडी सी मुस्कान।

टोपी में ही सुख मिले ,ढकती सिर औ कान।

38,अमृत पीकर ना हुआ,कोई अमर सुजान।

विष पीकर भी अमर हैं, नीलकंठ भगवान।

39: तुम तो हो मेरी सखे,मनमोहन मनमीत।

शप्तपदी के समय के,सुन्दर ,मोहक गीत।

40,प्रेम पाश से भी बड़ा,मोहपाश का रोग।

वो कुछ पल का रोग है,ये जीवन का रोग।

41,थे नयनों से जब  झरे,कविता, दोहे ,छंद।

तब मन ने  तोड़े सखे!,जीवन के अनुबंध।

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: राजनीति पर दोहे

 -राजनीति में आ गये,लालबुझक्कड़ आज।

बिन बोले ,बोले फिरें,बोलें न आवे लाज।

-सब बड़बोले हो गए,झूठे सच्चे बोल।

मनवा तू ही चुप्प हो,मत जिव्हा को खोल।

-उल्टे -सीधे दिन हुये, उल्टी -सीधी रात।

बड़े -बड़े बक्कड़ यहाँ, बड़ी -बड़ी हैं बात।

-राजनीति में आ गई,गन्दी गाली ,बात।

चोर -चोर का खेल है,लूटे दोनों हाथ।

46-सबके अपने तर्क है,सबके अपने शोर।

 राजनीति में आ गये,ओने पौने चोर।

जो चुप्पी कह नहीं पाती, उसे फिर शोर कहता है।

बुरा क्या मानना  जो कुछ कोई  मुॅहजोर कहता है।

 कहने का क्या ? कहने दो, कहने से कुछ नहीं होता,

 उसे सब पप्पू कहते हैँ , तुम्हें वो चोर कहता है।

अशोक मधुप

: शब्दों में बॅधते नहीं, जीवन के अनुबंध।

अतुकांत अच्छे  लगें ,

कुछ रिश्तों के छन्द।

नदिया को बांधो नहीं, बंधन में श्रीमान।

बंधते मैली होयगी, इतना रखना ध्यान।

: जो बीता बीता सखे,बीतेगा हर रोज।

इसकी  चिंता छोड़ तू,रोज मना बस मौज।

जाने कितने स्वप्न थे, जाने कितनी बात।

तन तो सोया ही रहा,मन तो जागा रात।

जाने कितने स्वप्न थे, जाने कितनी बात।

तन तो सोया रात में,मन तो जागा रात।

अशोक मधूप

सुबह हो गयी सपनों, को विराम देते हैं।

लक्ष्य  पाने के लिए रोज इम्तहान देते हैं।

क्यों जवानी गॅवाते हो  ? प्यार की खातिर?

 फौजी को देखो ,वतन पर अपनी जान देतें हैँ।

: आज की सलाह-

सब धंधे छोड़ो सभी ,चलो बनाये इत्र।

इसमें भारी लाभ है,ये ही करलें मित्र।

-बढिया कारोबार है,घर महकावे खूब।

धन ही धन बरसे यहां,

हल्दी लगे ना दूब।

अशोक मधुप

 अब तो भावे ना सखे,प्रेम प्यार की बात।

ठंडी के हालात में ,थर थर कांपे गात।

अशोक मधुप


30/12/2021, 12:10 am - Ashok Ji: लो ये भी बीता सखे,चलो पुराना साल।

जो बीता अब क्या करें,उसपर सोच मलाल।

-अशोक मधुप


 

अशोक मधुप

 घर के ऑगन संग था,प्यार, प्रेम ,मनुहार।

फ्लेटो की दुनिया यहां,

नहीं मिलेगा यार!

-अशोक मधुप

L नया साल जब आएगा , देखेंगे उस ठौर।

अभी अभी है तो सखे, इसी साल का दौर।

अशोक मधुप

विदाई पर दोहे-

 

 चलो विदा देते तुम्हें!,रही साल भर जंग।

खट्टी मीठी याद तो,सदा रहेंगी संग।

 -तुमने तो सपने किए,कईं मेरे साकार।

नफरत तो कम ही मिली, बहुत मिला पर प्यार।

- कई विदा हमसे हुए, कई जुड़े हैं संग।

नफरत पर जीती सदा,प्रेम- प्यार की जंग।

अशोक मधुप

 

 हमने लहरों पर लिखा,प्रीत ,मीत का नाम।

प्रेम हमारा राम है,प्रेम हमारा श्याम।

अशोक मधुप

 वक्त बहुत शैतान है,खेले नूतन खेल।

कभी चढ़ावै रेल पै, कभी चढ़ावै रेल।

सागर की लहरें उठीं कहने अपनी बात।

 चंदा ही बचता रहा,पूरी-पूरी रात।

-अशोक मधुप

: शायद यह सौभाग्य था, या प्रभु का वरदान।

बिना बुलाए आ गये, शबरी घर भगवान।

अशोक मधुप

वक्त पकड़ लाया हमें,दूजी दुनिया द्वार।

अनुपम शोभा है यहाँ,नहीं पुराने यार।

अशोक मधुप

[: हमने लहरों पर लिखा,प्रीत ,मीत का नाम।

प्रेम हमारा राम है,प्रेम हमारा श्याम।

वक्त बहुत शैतान है,खेले नूतन खेल।

कभी चढ़ावै रेल पै, कभी चढ़ावै रेल।

 सागर की लहरें उठीं कहने अपनी बात।

 चंदा ही बचता रहा,पूरी-पूरी रात।

 शायद यह सौभाग्य था, या प्रभु का वरदान।

बिना बुलाए आ गये, शबरी घर भगवान।

वक्त पकड़ लाया हमें,दूजी दुनिया द्वार।

अनुपम शोभा है यहाँ,नहीं पुराने यार।

अशोक मधुप

: तुमने तो जानी नहीं,उसके मन की बात।

रजनी तो रोयी सखे, पूरी पूरी रात।

 प्रभु तो आए हैं सदा, देने जीवन ज्ञान।

मनवा ही नादान है, सोया चादर तान।

शेर

 इस ठंड के मौसम में ज्यादा

दोस्ती नही अच्छी,

तुम अपनी रजाई में मस्त रहो,

मैं अपने बिस्तर मै खुश रहूं।

 हम सब तो हैं राही,

ट्रेन के साथी जैसे।

जीवन एक सफर है।

कोई यहाँ उतरा।

कोई वहां उतरा।

कुछ का सफर अभी

जारी है।

कुछ के उतरने की

 तैयारी है।

अशोक मधुप

[0:04 am, 11/01/2022] Ashok Ji: देश में   हर जगह आज तो   ,

राजनीतिकरण हो गया।

महाबली देखते रह गए,

द्रौपदी का वरण हो गया।

काम भी सब अधूरे रहे ।

उम्र का ही क्षरण हो गया।

जुगनू हावी जरा क्या हुए?

रोशनी का हरण हो गया।

लोगों को फल  बांट करके,

वो दानी करण हो गया।

भोर में कल ऋचाएं सुनी,

शुद्ध अंतःकरण हो गया।

बुढ़ापा क्या आता दिखा !

वो प्रभु की शरण हो गया।

कल सीता का हुआ था हरण

आज रावण हरण हो गया।

अशोक मधुप

[0:05 am, 11/01/2022] Ashok Ji: दो रोटी ही चाहिये,बाकी सब बेकार।

इतना मिल ही जाएगा ,क्या चिंता है यार।

अशोक मधुप

[7:33 am, 12/01/2022] Ashok Ji: जीवन के संग्राम में,लड़ते बीती भोर।

तेरी चाहत और थी, मेरी चाहत और।

अशोक मधुप

[0:05 am, 13/01/2022] Ashok Ji: चंदन पर दिखता नही, अब तो उनका संग।

राजनीति में आ गये,चलकर सभी भुजंग।

-अशोक मधुप

[7:36 am, 13/01/2022] Ashok Ji: कल के शत्रु ,मित्र बने, राजनीति में आज।

झूठ बोलते किसी को,जरा न आवे लाज।

अशोक मधुप

[7:36 am, 13/01/2022] Ashok Ji: ठंडी ठंडी भोर है,कोहरा छाई शाम।

होते गर तुम पास तो,खूब छलकते जाम।

---अशोक मधुप

[7:19 am, 15/01/2022] Ashok Ji: फूल दे रहे घाव लो,काॅटे दें पैबंद।

बदली जग की चाल में,उलझे -सुलझे बंद।

अशोक मधुप

[7:19 am, 15/01/2022] Ashok Ji: गलत यदि  जो  कुछ हुआ,क्यों रोऊँ सरकार?

जीवन में  तो वक्त ने ,दिये बहुत उपहार।

-अशोक मधुप

[7:20 am, 15/01/2022] Ashok Ji: चलो अब कुछ ऐसे जीवन को गुजारा जाए,

अमृत की जगह, थोड़ा जहर भी खाया जाए।

अशोक मधुप

[7:21 am, 15/01/2022] Ashok Ji: राजनीति में आज तो,आया है भूचाल।

गांधारी तो मौन है ,बेटा है वाचाल।

-अशोक मधुप

[7:54 am, 16/01/2022] Ashok Ji: शहरी माया - जाल में,टूटे घर - परिवार।

मुखिया टूटा देखता,

सपनों का संसार।

अशोक मधुप

[7:55 am, 16/01/2022] Ashok Ji: शहरी माया - जाल में,टूटे घर - परिवार।

मुखिया टूटा देखता,

सपनों का संसार।

अशोक मधुप

[0:12 am, 17/01/2022] Ashok Ji: सागर तूने नाप दी, दुनिया और जहान।

मेरे मन को नाप दे, हो तेरा अहसान।

अशोक मधुप

[0:09 am, 18/01/2022] Ashok Ji: बीते को छोड़ो सदा,बचा सम्भालो मित्र।

रोज  रोज रचते रहो,

सुंदर सुंदर चित्र।

अशोक मधुप

[0:14 am, 18/01/2022] Ashok Ji: हत्या में पत्रकार की ,खूब  फॅसा महाराज।

डेरा छूटा ,जेल में, अब है खूनी बाज।

-अशोक मधुप

[0:16 am, 18/01/2022] Ashok Ji: जाने कबका पाप था ?जाने किसका श्राप?

हम कस्तूरी मृग बने,भाग रहे हैं आप।

-अशोक मधुप

[0:03 am, 19/01/2022] Ashok Ji: धन-तृष्णा ऐसी बढ़ी,न है एकपल चैन।

सपनो में भी भागते, कट जाती है रैन।

-अशोक मधुप

[0:04 am, 19/01/2022] Ashok Ji: गीत फिर गुनगुना के देखते हैं,

बातें कुछ सुनसुना के देखते हैं।

कुछ नया करने की खातिर आज से,

तुम्हे अपना बनाके देखते है,

  -- अशोक मधुप

[0:13 am, 20/01/2022] Ashok Ji: मी-टू अभियान के दौरान लिखा एक व्यंग्य

अच्छा हुआ कान्हा

तुम द्वापर में आए।

कलयुग में नहीं आए।

आज होते अगर,

तो बहुत संकट झेलते।

कभी मी- टू के चक्कर में आते।

तो कभी मिथ्या फॅसाये जाते।

समाचार पत्र में आपका नाम ,

नित्य विवाद में घिरता ।

नाम तो खूब कमाते।

किन्तु अपयश और

 अपमानजनक टिप्पणी

सह न पाते।

 गोपियाॅ  शिकायत

न भी करतीं ,

आप से सच्ची प्रीत निभातीं ,

तब  कंस या  आपका

कोई दुश्मन ,दुश्मनी निभाता ।

किसी को पैसे देकर

फर्जी

शिकायत करा देता।

आप रासलीला के रसिया,

गोपियों के मन -बसिया।

मुरली को अधरों पर धारण करते,

त्रिभंगी मुद्रा में अमृत-रस बरसाते ,

तो सबको यकीन आ जाता।

आरोप लगाया जाता।

रिपोर्ट आपकी की जाती ।

पुलिस को दान-दक्षिणा

दी जाती ।

पुलिसकर्मी ऐश करते ।

दोनों ओर से

अपनी मुट्ठी गर्म करते।

आप खुशामदें भी करते।

पैसे भी लगाते।

कोर्ट कचहरी के चक्कर

लगाते -ल

[10:00 am, 20/01/2022] Ashok Ji: मिट्टी के घरौंदे अब कौन बनाता है,

महल रेत के अब कौन सजाता है।

फोन से रिश्ते भी डिजिटल हो गए,

अब कौन मेरे आता है,

अब कौन तेरे जाता है।

अशोक मधुप

[4:33 pm, 21/01/2022] Ashok Ji: तूफान आए तो आसमान ऐंठता है,

अखाड़े में तो हर पहलवान ऐंठता है।

पढ़ाई भी क्या बड़ी मुसीबत है,

बात बेबात उस्ताद कान ऐंठता है।

                 अशोक मधुप

[4:34 pm, 21/01/2022] Ashok Ji: दूर देश मे जाकर बसने वालों की पीड़ा पर एक दोहा-

 

भले ही यहाँ पर नहीं ,अपनेपन की छाॅव।

अब तो ये ही देश है, अब तो ये ही गांव।

अशोक मधुप

[0:06 am, 22/01/2022] Ashok Ji: हमने तो मानी नहीं, इस ठंडी से हार।

 बस कुहरे ने रोक दी, जीवन की रफ्तार।

अशोक मधुप

[0:07 am, 22/01/2022] Ashok Ji: सूर्य  अभी लाए नहीं ,किरणों का उपहार ।

उससे पहले आ गये, बिकने को अखबार।

-अशोक मधुप

[0:09 am, 22/01/2022] Ashok Ji: प्रकृति के हँसने हँसाने का मेला,

जीवन के उल्लास मस्ती का मेला।

मां सबके जीवन में आलोक बरसे,

पुष्पों पे मंडराए मधुपों का रेला।

-अशोक मधुप की ओर से

 बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ

[0:07 am, 23/01/2022] Ashok Ji: मन की बातें मन को ही कह लेने दो,

तन की पीड़ा तन को ही सह लेने दो।

रोकोगे तो पानी सा जमजाएगीं ,

मत रोको दरिया  बन बह लेने दो।

 अशोक  मधुप

[0:08 am, 23/01/2022] Ashok Ji: जो जी में आए बको,जो चाहे दो भौंक।

राजनीति की दाल में, दो कैसे भी छौंक।

-अशोक मधुप

[0:28 am, 24/01/2022] Ashok Ji: सबकी अपनी दौड़ है,सबकी अपनी धूप।

इसीमें ही सिमटे हैं, सारे निर्धन-भूप।

अशोक मधुप

[0:29 am, 24/01/2022] Ashok Ji: मौसम ये बारिश  वगैरह वगैरह,

ये कीचड़ ये गारा वगैरह वगैरह।

बैठक में बैठो ,गप्पे लड़ाएं,

करें शेर- शायरी वगैरह वगैरह।

अशोक मधुप

[0:04 am, 25/01/2022] Ashok Ji: भारत में

 जनतंत्र है।

गणतंत्र है।

प्रजातंत्र है।

जन का!

प्रजा का!

गण का देश।

वीर,वीरांगनाओं की धरा ।

महापुरुषों ,संतों ने,

 जिसमें प्रेम भरा।

इसे फिर आदिम युग

में मत ले जाइए।

रजवाड़ों, धर्म,

जाति,समुदाय,

सम्प्रदाय

में मत बाँटिए।

क्रांतिकारियों के

सपनों का देश बनाइये।

आइये सच्चा गणतंत्र

मनाएॅ।

मिलकर देश को आगे

बढ़ाएॅ।

अशोक मधुप

समस्त भारतवासियों को गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएॅ ।

[7:05 am, 25/01/2022] Ashok Ji: ज्यादा ठंडी में सखे, मौसम भी बीमार।

खाँसी ,नजला संग ही, आया तेज बुखार।

आया तेज बुखार,बहुत बेचैनी भैया।

बारिश में बीमार,बड़े ,बच्चे ओ गैया।

मौसम चाहे दवा,

रजाई ,जैकेट,बण्डी।

कुछ तो करो उपाय , तभी तो भागे ठंडी।

-अशोक मधुप

[2:39 pm, 25/01/2022] Ashok Ji: आओ जिंदगी के मसले ,कुछ ऐसे हल कर ले,

कुछ चीजें अब सुलझा ले,कुछ बाते  कल कर ले।

अशोक मधुप

[0:03 am, 27/01/2022] Ashok Ji: धमकियां भी हुई बेअसर दोस्तों।

शान से मनाया गणतंत्र दोस्तों।

फिदाइन भी अब आते डरने लगे,

देश के सैनिकों को नमन दोस्तों।

अशोक मधुप

[0:03 am, 27/01/2022] Ashok Ji: जनतंत्र की जय हो

गणतंत्र की जय हो।

छोटे बड़े दुश्मन पे,

हमारे तंत्र की जय हो।

डोकलाम  किया विजित

कश्मीर  भी  अविभाजित

शत्रु संहारक अपने

रक्षा-तंत्र की जय हो !

जनतंत्र की जय हो

गणतंत्र की जय हो।

सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

[7:03 pm, 27/01/2022] Ashok Ji: तुम तक पहुंची ही नही,

अपनी चाहत मीत

हमतो लिखते ही रहे, रोज तुम्हारे गीत।

अशोक मधुप

[0:02 am, 28/01/2022] Ashok Ji: जीवन का दर्शन यही,जीवन का निष्कर्ष।

इच्छा सीमित कीजिये,खूब मनाएं हर्ष।

अशोक मधुप

[0:04 am, 28/01/2022] Ashok Ji: बातों के अब संग में,  दीखे है तस्वीर।

यक्ष युगल सहता नहीं,आज विछोह की पीर।

-अशोक मधुप

[0:01 am, 29/01/2022] Ashok Ji: आवारा आयु हुई, हरजाई सी सांस।

मन करता अपने रहें,हरदम अपने पास।

-अशोक मधुप

[0:03 am, 30/01/2022] Ashok Ji: भोर हुई जागो प्रिय  ,खोलो मन के द्वार।

वक्त खड़ा है राह में, लेकर सपन हजार।

-अशोक मधुप

[0:03 am, 30/01/2022] Ashok Ji: Fb-039/018

 

सपनो को सच करने की,

तैयारी कर लो।

जीना है तो खतरों से

भी,यारी कर लो।

#अशोकमधुप

[0:11 am, 31/01/2022] Ashok Ji: अब तो होता है नहीं,इनके छल से कष्ट।

संत, पुलिस, नेता सभी, बन बैठे पथभ्रष्ट ।

अशोक मधुप

[0:12 am, 31/01/2022] Ashok Ji: शायर जैसा दर्द रख,प्रेमी जैसी पीर।

 लेखन में खुद आएगा, तुलसी और कबीर।

अशोक मधुप

[0:04 am, 01/02/2022] Ashok Ji: मोदी जी! आपने बहुत अच्छा किया।

चुनाव --पूर्व जो यह ,

बहुत अच्छा बजट दिया।

सब जय  जय बोल रहे हैं।

सब प्रशंसा कर रहे हैं,

आपकी और आपकी सरकार के,

इस अंतरिम बजट की।

काश! ये सुविधाएॅ ,

आरंभिक काल से

प्रदान की होतीं तो पहले ही

आप का गुणगान करती।

अपनी सरकार

का कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व ,

देश की निरीह,भोली जनता को

बढ़िया बजट दिया।

सरकार का

कार्यकाल समाप्त

होने से पूर्व

एक काम

और करते जाओ।

पाॅच साल में होने

वाले चुनाव

के हर साल

होने की व्यवस्था भी ,

करा दो।

ताकि जनता को हर साल

ऐसा ही अच्छा

बजट मिले।

लोगों के ह्रदय -कमल

खिलें।

सब आपकी जय जय

बोलेंगे।

आपको वोट ही

नही देंगे,

वोटों से तोलेंगे।

अशोक मधुप

[0:05 am, 01/02/2022] Ashok Ji: वक्त वक्त का खेल है,वक्त वक्त की बात।

राजा जूते गांठता,रानी को ले साथ।

अशोक मधुप

[0:06 am, 01/02/2022] Ashok Ji: राजनीति में  बढ़ रही,वंशवाद की गैल।

जनता बन कर रह गयी, बस कोल्हू का बैल।

-अशोक मधुप

[0:03 am, 02/02/2022] Ashok Ji: दिल तो दिल है,कब

 पागल हो ,पता नही।

यह दिल की लगी है ,

उम्र की कोई खता नही

अशोक मधुप

[

[0:10 am, 03/02/2022] Ashok Ji: वसन्त के साथ पतझड़ ,को भी आना होगा।

यहाँ जीना है तो हर,दर्द उठाना होगा।

अशोक मधुप

[0:13 am, 03/02/2022] Ashok Ji: तुम कहते हो,

विकास नहीं हुआ।

क्या विकास रुकता है?

आलोचना से क्या मिलता है ?

क्या वास्तव में विकास रुक गया ?

क्या समय का चक्र थम गया ?

क्या सूर्य की गति कम हुई है?

आज पतझड़ है तो कल बसन्त होगा।

रात के बाद दिन होगा ही होगा ।

हो सकता है विकास ,

आशा के अनुरूप न हुआ,

तो कल को अधिक भी होगा।

मित्र!

यह तो चलने वाली

अनवरत प्रक्रिया है।

सदा चलती रहती है।

सदा जारी रहती है।

सदा जारी रहेगी।

अशोक मधुप

[7:30 am, 04/02/2022] Ashok Ji: सपनों को देना नहीं,जीवन बीच विराम।

सपनों संग जीवन है,सुंदर और ललाम।

अशोक मधुप

[7:31 am, 04/02/2022] Ashok Ji: मौसम ले आया घने,कोहरे की सौगात।

घर-बाहर भी  भीगते, अब वसुधा के साथ।

-अशोक मधुप

[7:33 am, 04/02/2022] Ashok Ji: सपनों को साकार कर,सपनों से कर प्यार।

मेहनत इसमें घोल कर,जीत सभी संसार।

अशोक मधुप

[7:07 am, 05/02/2022] Ashok Ji: कठिन दौर में भी नहीं ,रुके समय के पाॅव।

मनवा क्यों थामे खड़ा?

अपनी जीवन नाव।

अशोक मधुप

[7:15 am, 05/02/2022] Ashok Ji: पाना है आकाश तो, मन में रख विश्वास।

मंजिल खुद ही आएगी,चलकर तेरे पास।

अशोक मधुप

[0:04 am, 06/02/2022] Ashok Ji: ये भी ना अच्छे सखे! , वो भी हैं ना नेक।

पावर में जो चल रहा,रहा लूट हर एक।

अशोक मधुप

[0:05 am, 06/02/2022] Ashok Ji: समय समय का फेर है,समय समय की बात।

कभी के दिन होते बड़े,कभी की होती रात।

अशोक मधुप

[0:07 am, 06/02/2022] Ashok Ji: कतरा- कतरा दिन कटे, पल-पल घटती रात ।

जीवन वटके झर रहे ,एक -एक कर पात।

अशोक मधुप

[0:08 am, 07/02/2022] Ashok Ji: रातों- रातों जागता ,कैसा है संजोग ?

क्या मुझको भी लग गया,प्रेम प्यार का रोग ?

-अशोक मधुप

[0:08 am, 07/02/2022] Ashok Ji: मानव का कुछ नहीं बड़ा, रही वक्त की शान।

सीबीआई से हुई, आज पुलिस  बलवान।

-अशोक मधुप

[0:08 am, 07/02/2022] Ashok Ji: वख्त का इरादा,कोई अच्छा नहीं है।

वह सब जानता है,कोई बच्चा हीं है।

ये सियासतदानों की नगरी है साहब,

यहाँ कोई भी हो ,मगर सच्चा नहीं है।

अशोक मधुप

[0:09 am, 07/02/2022] Ashok Ji: मौसम के हालात सा, ये जीवन का रंग।

कभी चढ़े, उतरे कभी,

ज्यों पीली हो भंग।

अशोक मधुप

[0:02 am, 08/02/2022] Ashok Ji: कल आयी थी आपदा ,हमे डराने मीत।

सबने सीना तान के,पायी उसपर जीत।

-अशोक मधुप

[0:03 am, 08/02/2022] Ashok Ji: मन ही मन हो जायगा, बस सीधा संवाद।

जब भी तुम बेचैन हो,

करना मुझको याद ।

अशोक मधुप

[0:04 am, 08/02/2022] Ashok Ji: माया तो ठगती  सदा, छलिया है  संसार।

चंद खुशी की चाह में,बीता जीवन यार।

अशोक मधुप

[0:05 am, 08/02/2022] Ashok Ji: वसंत है,मधुमास की बातें करो। हास ओ परिहास की बातें करो।

फूल ओ कलियों  की बेला में  सखे

प्यार के अहसास की बातें करो।

अशोक मधुप

[0:17 am, 09/02/2022] Ashok Ji: कुछ खोकर कुछ पाना भी अच्छा लगता है।

कभी देर से घर जाना भी अच्छा लगता है।

जोर जोर से  हँसने वाला हर बुड्ढा भी,

मुझको तो बस  छोटा सा बच्चा लगता है।

अशोक मधुप

[0:20 am, 09/02/2022] Ashok Ji: कैसी -कैसी बातें हैं,

कैसे -कैसे शोर।

चोर बताने में जुटे,

अब दूजे को चोर।

-अशोक मधुप

[0:26 am, 09/02/2022] Ashok Ji: शुभ, शुभ ,शुभ बोलों शुभे,

शुभ हों सारे काम।

शुरू करो दिन का सफर,

लेकर हरि का नाम।

अशोक मधुप

[0:26 am, 09/02/2022] Ashok Ji: जीवन से भी बड़ी है,मानव की बस दौड़।

भगते भगते भाग रहे,पावे और न छोर।

अशोक मधुप

जीवन से भी बड़ी है,मानव की बस दौड़।

हर पल दौड़े जा रहे,पावे और न छोर।

:जब से तुम रूठे सखे,रुंठा है संसार।

कोई अब तो ना करे,नेह, पयार,मनुहार।

: जीवन बहता जा रहा, बन नदिया की धार ।

जाने कब सागर मिले ,कब हो नौका पार?

−चलने वाला चल गया, जो चलनी थी चाल।

मन दर्पण  दरका गया,ऐसा किया कमाल।

अर्थ बहुत चिंतित भए,शब्द रहे हैं रोय।

मतलब के संसार में,कैसे रिश्ते बोय?

−वोटर ने फिर से किया ,केजरी को  ही प्यार।

दिल्ली का दिल आ गया ,फिर झाडू पर यार!

एक मित्र ही खोजिए,जो हो दुख का यार।

सुख में तो मिल जाएंगे,यारा मित्र हजार।

 

−एक मित्र ही खोजिए,जो हो दुख का यार।

सुख में तो मिल जाएंगे,यारा मित्र हजार।

−समय सदा ना एक सा,यह इस जग की रीत ।

कभी किसी की हार तो ,कभी किसी की जीत।

 −या तो मर्जी हो कभी,या बेमर्जी मौज।

अनचाहे पकवान भी,लगते छप्पन भोग।

दुख में साथ न छोड़ते,स्वयं उठाते भार।

सुखी रहे हर हाल में,मित्रों का संसार।

−प्रेम डगर है अगन की,जल कर कुंदन होय।

राधा, मीरा, हीर की,पीड़ा समझे कोय।

−प्रेम डगर है अगन की,जल कर कुंदन होय।

राधा, मीरा, हीर की,पीड़ा समझे कोय।

 

−सेना को दे दीजिए  ,अब तो सब अधिकार।

घर में घुसकर कीजिये, दुश्मन का संहार ।

- कितनी माॅ ने खो दिए, अपने प्यारे लाल।

देखो लज्जित हो गया, भारत माँ का भाल।

दिन बीता पूरा सखे! आयी होने रात।

वेलेंटाइन दौर है  ,कर लो कोई बात।

शिवरात्रि पर भोले का, अभिनंदन करतें हैं।

अक्षत,रोली चंदन से, रजवंदन करते हैं।

कैसे भी हालात हों, कैसी भी हो बात।

अब तो छूटेगा नहीं ,मित्र ,तुम्हारा साथ।

−माया में डूबा मनुस,  बुरी तरह बेहाल।

वख्त दौड़ता जा रहा,हिरनी की सी चाल।

प्रेम प्यार में जो पंगा, बना कबीरा सूर।

जहर पान करते रहे ,मीरा ओ मंसूर।

- जीवन के कुरुक्षेत्र का, जब से देखा हाल।

रातें बैरिन  बन गयीं,मेरी सालों साल।

−जीवन के कुरुक्षेत्र का, जब से देखा हाल।

रातें बैरिन  बन गयीं,मेरी सालों साल।

−पुष्पों के टकरा गए,आपस में मकरंद।

तभी धरा भी गा उठी,दोहे,कविता,छन्द।

लो वसंत फिर आ गया , हमें खिलाने फाग।

तन मन को रंगने लगा,सजनी का अनुराग ।

खुदगर्जी  है गा रही,द्वेष -भाव का राग।

चंदन वन में लग गयी,लो नफरत की आग।

आज आपके शहर की ,थी यह अंतिम शाम।

चलते अपने देश को,ले ईश्वर का नाम।

 प्रेम डगर पर बिन रुके, जो चलते  दिन रात ।

पीना पड़ता जहर है,मीरा हो सुकरात।

 जीवन की इस डगर का,मिलता ओर न छोर।

कब हो जाए सांझ औ,कब हो जाए भोर।

मौला !कैसी है करी ?ये दिल के दरम्यान,

धीरे -धीरे मन बॅटे, अब बॅट गए मकान।

अशोक मधुप

भोले को हो चाहते, भोला बनजा मीत।

माया तृष्णा त्याग के, जीवन को ले जीत।

 

 शेर

 इस भयंकर शीत से डरकर सखे,

सूरज  कोहरे में छिपके बैठ गया।

 मत निकलना रजाई से बाहर,

 अब कमरे में आ गया कोहरा।

अशोक मधुप

(21 फरवरी 2022 तक

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