सखिही सही ,तुम हो तो एक
सखिही सही ,तुमहो तो ।
जीवन-साथीन सही,
परसाथ हो तो ।
अच्छाहै कि तुम -हम
मित्रहैं। अच़्छे मित्र ।
दुखसुख के साथी।
एकदूसरे के मददगार।
एकदूसरे को समझने वाले ,
मित्रतामें बराबर के साझीदार।
चेहरादेखकर ही भाव पहचानने वाले।
आवाजसे मन की बात जान जाने वाले।
अच्छाहुआ हम नहीं ,बनपाए पति पत्नी।
नहींबन पांए जीवन सखा।
नहींबंध पाए दांपत्य सूत्र में।
पति-पत्नीहोते तो ,नहींहोता
बराबरका रिश्ता।
नहींहोती ,बराबरकी पहचान।
पुरूषप्रधान समाज में तुम्हें!
नहींमिलता बराबर का मान।
बराबरका सम्मान।
बराबरका दर्जा ,कभीनहीं पातीं।
कभीझिड़की झेलतीं,
तोकभी डाॅट पातीं।
कभी-कभीतो बेवकूफ
औरपागल जैसे शब्दों से
सम्मानितकी जाती।
तुमपति के इशारों परमुस्करातीं।
उसकेगुस्से पर कुम्हलां जातीं।
घरको अपना सर्वस्व देंती।
पतिके लिए सजतीं,
उसीके लिए सँवरती।
परबहुत कुछ झेलतीं।
कभीबच्चों में ,तोकभी परिवार में बंटतीं।
प्यारमें भी सब का बराबर हिस्साकरती।
तुमकरती सबसे न्याय,
परतुम गृहणी होकर भी ,पतिसे कम रहतीं।
पतिका वर्चस्व बना रहे ,
इसलिएहर पर्व पर पति के पांव छूंती।
उसेपति परमेश्वर मानती।
औरपति कभी नहीं मानता तुम्हेअपने बराबर।
तुम्हारेलिए वह पति परमेश्वर होता,
किंतु तुम उसके लिए कभी देवीनहीं बन पातीं।
तुमतो उसकी पत्नी हीं रहतीं।
वहकरता तुम
पर शक ।
सप्तपदीके सारे वचन तुम्हारे लिएरहते ,
सारीजिम्मेदारी तुम्हारी।
तुमसाल में कई बार उसके पांव छूतीं,
कहनेपर पांव दबातीं।
सिरमें तेल और बालों में मेंहदीभी लगातीं।
ऑफिसया पार्टी में जाते समय
पतिको टाई बांधती
तैयारकरती ।सूट पहनातीं।
पर
तुम्हारेबीमार या थके होने से
नहींहोता किसी का वास्ता,
किसीपरिवार के दूसरे
सदस्यका लेना देना।
तुमतेज बुखार होने,शरीरटूटने
केबाद भी परिवार के लिए जूझतीं।
तुम्हारीपरेशानी में
नपति सिर में तेल लगाता।
न पाॅव दबाता।
हरसंघर्ष में तुम्हे ही
डटनापड़ता।
पूरीआयु मीत
तुम्हेही खटना पड़ता।
अच्छाहुआ।
बहुतअच्छा हुआ मित्र,
हमनहीं बंध सके प्रणय बंधन में।
नहींपरवान चढ़ सका अपना प्यार।
नहीँबन सके जीवन साथी।
अबहम न लड़तें हैं,नाझगड़तें हैं।
मित्रहैँ,साथसाथ चलतें हैं।
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मैं जानता हूँ
बहुत दूर हैं हम।
जाति ,धर्म ,परम्परा के ,
बंधन में बॅधे हैं हम ।
पर दिल कभी तो
धड़कता होगा?
जीवन के पंखों पर
उतर कर,
कईं बार आने को मचलता होगा?
मैं जानता हूॅ कि मजबूरियाॅ हैं,
पैरों में रिश्तों की बेड़ियाॅ हैं।
वरना दिल तो दिल है।
तेरा या मेरा
किसी का भी
मिलने को,
कभी तो मचलता होगा?
2
घर से कबाड़ निकलते समय,
संदूक में रखी एक पुरानी शर्ट
देखकर मैं चौक गया।
लगभग 50 साल पुरानी शर्ट।
पीले हरे रंग की बड़े चेक की शर्ट,
पढ़ाई के समय की मेरी प्रिय शर्ट।
एकदम से सब कुछ याद आ गया,
याद आ गया कि ये शर्ट तो तुम्हें
भी बहुत पसंद थी।
तुम्हारी सदा इच्छा रहती की मैं
इसी शर्ट को पहनू।
लंबे बाल रखूं।
जीवन की सबसे प्यारी
पसंदीदा शर्ट
कब संदूक में रखी गई ,
याद ही नहीं ।
कैसे रखी गई पता नहीं।
40-45 साल से रखी शर्ट
बुरी तरह मुस गई है।
जगह जगह सलबटे पड़ गई है।
-इसका क्या दोष इस अंतराल
में
तो जाने कितनी शिकन चेहरे पर आ गईं।
शर्ट की शिकन तो मै देख रहा हूं,
शीशे में रोज देखने के बाद भी
चेहरे की शिकन का पता ही नही चला।
रोज देखने के बाद भी
वे कब चेहरे पर आ जमी,
दिखाई ही नही दीं।
शर्ट को उठाकर धीरे से
उसे खोलता हूं।
झटक कर हाथ फेरकर
सलबटों केेे हटाने की कोशिश करता हूूं।
किंतु वह इतने लंबे समय
रखे रखे बहुत सख्त हो गईं हैँ।
ऐसे ही तो मिट्टी , कपड़ा, फल पत्ते
और मानव शरीर
लंबे समय पत्थरों में दब बन जाता हैं फोसिल्स ।
शर्ट को उलट पुलट रहां हूं,
उसकी ऊपर की जेब में
हाथ डालता हूँ ।
जेब में कुछ कचरा सा मिलता है।
बाहर निकालकर देखता हूं।
चौंक पड़ता हूूं देखकर ।
कचरा कुछ ओर नहीं,
मूंगफली के छिलके हैं।
ये छिलके बहुत पुराने।
शर्ट के पहनने के समय के ।
जवानी के आलम के ।
और याद आ गई वह कहानी,
तुम्हारे साथ बिताए, पल,
सब कुछ भूल अतीत में चला गया,
याद आ गए वह तुम्हारे साथ बिताए,
एक एक पल,एक एक क्षण।
मूंगफली के इन छिलकों को देख
याद आ गया वह दिन,
जब तुम और मैँ कॉलेज के लान में ,
डिटोनिया की एक झाड़ी के पास बैठे
खा रहे थें मूंगफली।
छिलके इकट्ठे कर ते जा रहे थे।
एक रूमाल पर।
कई दिन की छुट्टी
और मौसम खराब होने के बाद
आज खुला था कॉलेज।
हालाकि सवेरे आसमान में
बहुत घना को हरा था।
किंतु अब मौसम साफ था।
हलकी कुनमुनी धूप अच्छी लग रही थी।
शरीर को सुख दे रही थी।
कई दिन मौसम खरब रहने
और अवकाश के बाद
आज कॉलेज में आवाजाही बहुत कम थी,
न के बराबर।
हमारे जैसे कुछ जोड़े ही दिख रहे थे
अपने में मस्त। प्यार में डूबे। एक दूसरे में खोए।
तुम मुझे और मैं तुम्हे मूंगफली छीलकर
उसके दाने खाने को दे रहे थे।
और रूमाल पर एकत्र करते जा रहे थे
मूंगफली के दिलके ।
दोनों पूरी तरह बातों में मस्त थे।
और एक दूसरे की आखों में झांकते बाते
करते खाते जा रहे थे
मूंगफली के बादाम जैसे टैस्टी दाने।
मुझे ये ध्यान ही नही रहा कि मूंगफली खत्म हाने को हैं।
तुम़हारे चेहरे की मुस्कराहट का मै अर्थ नही समझ पा रहा था,
कि अचानक तुमने झटके से रूमसल उठाया,
उसपर एकत्र किए छिलके उतर दिए मेरे कपड़ों पर।
और शरारत से हंस्ती भाग गई कामन रूम में ।
आज 45 साल बाद मिली
इस शर्ट की जेब में मिले
मूंगफली के ये छिलके
याद दिला गए उस घटना की तुम्हारें साथ बिताए
उन क्षणों की जिन्हें मैँ भूल चुका था
बिसरा चुका था।
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