नववर्ष आ गया।

 

 

नववर्ष   गया।

गतवर्ष

अर्धरात्रि  में चुपके  से चला गया।

स्वर्णिमसमय

ऐसे अर्ध रात्रि  में क्यों जाताहै?

नवप्रभात

आशाकी नव किरन लेकर

आधीरात में ही चुपके से क्यों

आताहै?

दिनदहाड़े रवि की रोशनी में

आनाजाना होना चाहिए ना।

सरकारीकार्यालय की

डयूटीकी तरह से,

सवेरेनौ  बजे से

शामपांच बजे के बीच।

चुप-चुप चोरी -चोरी तो ठीक नहीं।

नाखुशी का आना ठीक,

नचुपचाप किसी का जाना ठीक।

भलेही वह दुख क्यों हो

दुखजागते  जाए,

तोउसका अहसास

औरआनन्द कुछ और ही होता है।

अपनेतो

नईकिरन की तरह प्रकाश में  आतेअच्छे होतें हैं।

कहकरआने और

बताकरजाने वाले मित्र ही सच्चे होतेहैं।

आधीरात के बाद से नया साल लग गया।

वर्षके अलावा कुछ भी तो नहीं बदला।

औरवैसे भी पुराने वर्ष को

जानातो था ही,

रुककरतो रहना नहीं था।

नएसाल को भी आना ही था

यहतो समय का चक्र है,

चलताही रहता है।

 सोते जागते

खातेपीते,हँसते-रोते।

निरन्तरअपनी गति से।

सबकुछ पहले जैसा ही है।

पृथ्वी,आकाश,समयजैसा था,

वैसाही है।

सहीमें कुछ भी नहीं बदला।

शहर,नदीनाले,पहाड़

सबकुछ पहले जैसा ही तो है।

सड़केवही पुरानी है,

इंसानभी वही है,उसकी

फितरतभी वही।

कर्बलाके मैदान में

लड़ने वाले भी

अपनेथे और महाभारत में भी l

सबपुराने षड्यन्त्र

सबपुराने चक्रव्यूह।

कुछही तो नहीं बदला।

आदमीपहले भी

 आदमी के खून का प्यासाथा ,

आजभी है।

पहलेमहाभारत थे,

अबविश्वयुद्ध हैं।

कहींहिटलर के गैस चेम्बर हैं।

तोकही हिरोशिमा नागासाकी

केबरबाद मंजर हैं।

सबइन्सान का ही किया

धराहै।

सबतबाही के मंजर पहले भी थे

तबाहीके मंजर आज भी है।

पहलेभी पशुपतास्त्र

और ब्रह्मास्त्रथे

आजभी परमाणु

और हाइड्रोजन बमहैं।

पहलेसे भी ज्यादा खतरनाक,

पहलेसे ज्यादा विनाशकारी।

नयासाल गया।

कुछदेर चलिये जश्न मना लें

कुछहँसले,कुछगा लें।

दुनियाविनाश के कगार पर अब भी है।

कहींकुछ नहीं बदला।

हां!  आजसवेरे से शीत

औरकोहरा कुछ अधिक है।

रोजअच्छी धूप निकलती थी,

वहआज नजर नहींं आई।

नएसाल पर मौसम  का बदलाव ,

कोहरे का आना,

लगताहै,इससाल के

 कष्टों में  और इजाफा होगा, 

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