गर्मी बहुत है
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गर्मी बहुत है।
घर से निकलतेदेह जलती है।
ए,सी में बैठकरकर रहे हो इंतजार।
क्या बात है मजेदार।
चांद देखना है तो कमरे से बाहरनिकलो।
छत पर आओ।
ईद के चांद के दर्शन बाद में करना।
पहले गर्मी और उमस का ,आनन्द उठाओ।
आकाश में छाई घुन्ध देखो,
इससे बचने पा उपाय सोचो।
ताकि ये आगे कभी
तुम्हारे मेरे ओर चांद के बीच
दीवार न बने।
तुम ओर में चांद को जिस शिद्दत से देखे,
वह भी उसी प्यास सेहमें निहारे।
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समंदर का बहाव
सब देखते हैं।
उसकी प्यास नही।
उसकी लहरों का
ज्वार भाता सब देखते हैं
उसकी बेचैनी नही।
काश वाह्य आवरण
के भीतर के दर्द सब समझते
तो तुम कुछ और होतीं
दुनिया कुछ और।
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अब खत आने बंद हो गए
सभी तरह के खत।
जो लाते थे मित्रों के संदेश।
बड़ों के आशीर्वाद।
छोटो को शुभकामनांए।
प्रियों का प्यार।
पत्र आते थे तो रहता था ,
डाकिये के आने का इंतजार।
कुछ तो पत्रों के इंतजार में,
रोज पोस्ट ऑफिस ही पहुँच जाते।
यहाँ अपने जैसे आने वालों से गप्पें लड़ाते ।
पहले दिन के किस्से सुनते-सुनाते,
अपने सुख -दुख बाँटते।
इतनी देर में डाक कर्मी चिट्ठी छाॅटते।
असीमानंद मिलता था, पत्र पढ़कर ,
उनको रखते थे सब संजोकर ।
एक तार में छेद कर पिरो दिए जाते थे सारे पत्र।
जरूरत पर इसीलिए वे सरलता से मिल जाते थे।
इधर उधर पड़कर खो नहीं पाते थे।
होती थी प्यार की बौछार,
दीवानगी से करते थे, डाकिये का इंतजार ।
अब ऐसा कुछ नही रहा।
मोबाइल ने सब बदल दिया।
न पत्र आते हैं ,न होता है डाकिये का इंतजार।
एक पल में मेसेज हो जाता है
इधर से उधर,मेरे पास से तुम्हारे पास।
वैसे आज बताने को नही कुछ खास।
रूटीन में सुप्रभात भेज दिया।
यह बताओ ,तुमने क्या किया आज ?
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यूॅ तो ये छत्रप हैं राजदरबार के ,
पर हैं महात्मा गाँधी के बंदर से ।
वही बोलते हैं जो राजा बुलवाता है।
वही सुनते हैं, जो राजा सुनाता है।
वही देखते हैंजो राजा दिखाता है।
यह दरबार है महोदय!
इसमें बड़े बड़े महारथी,
पिता श्री, दाद श्री,कुल गुरु, राज गुरु सब हैं।
किन्तु चीरहरण होते न ये देखते हैं,ना बोलते हैं।
समाधि लगा लेते हैं,
मौन हो जाते हैं ।
बापू के बंदर बन जाते हैं।
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गेहका आंगन बदल गया होगा।
नएलिबासों से मनबदल गया होगा।
जीवनकी पगडंडियों पर चलते मीत,
कब-क्याबचन बदल गया होगा।
अशोकमधुप
तितलीआकर कान में कुछ कह गयी।
चार बूंदे क्यों बरस कर रह गयीं?
प्यासीथीं बहुत पादपों की पांखुरी,
चोटबूंदों की पड़ी,सबसह गयी।
Am
गीतको गुनगुनाना सरल हो गया।
समस्याका जैसे कि हल हो गया।
कुछकदम क्या चले कठिन राह मे?
परपथ तो गीत -गजलहो गया ।
Am
Am
कैक्टसपर फूल से ,उगआए हम आप।
शकुंतलासम झेलते,दुर्वासाका शाप।
-अशोकमधुप
स्मृतियोंमें आने लगी,कैसीनई सुगंध?
मलयजलेकर आ गया,वहचंदन की गंध।
-अशोकमधुप
[
एकअंगडाई लो सुस्ती त्यागो
मित्रजागो
तुमउदास हो,रोरही हो,
तुमनेपति खोया है।
वक्तने तुम्हारे जीवन में विष बीजबोया है।
जीवनपथ पर तुम्हें सहारा देनेवाले,
अबवो मजबूत हाथ नहीं रहे ।
45सालसाथ साथ चलने वाले
अबवह तुम्हारे साथ नहीं रहे।
अबतुम अकेली हो,परेशानहो,
उनकोयाद कर अपना
आपाखो देती हो,
बातबात पर जब -तबरो देती हो,
तुम्हारीपीड़ा को वही जान सकता है,
जिसकाजीवन संबल गया हो,
सहारा खोया हो,
होठोंकी मुस्कान गई हो,
मांगका सिंदूर छिना हो,
जीवनका हीरों गया हो,
जोजार जार रोया हो,
जिसनेजीवन का संबल खोया हो ।
एकबात बताओ,
क्याऐसा पृथ्ची पर पहली बार हुआहै,
क्याइससे पहले लोगों ने जीवनसाथी
अपनेप्रिय को नहीं गवांया।
क्यायह दुख तुम पर ही पहली बार आया।
तुमपर यह दुख आया,
तुमरो रही हो,
उदासहो,जीवनसे निराश हो।
किंतुयहां तो कोई भी अमर नहीं है,
जोआया है,उसेजाना है,
जाकरफिर नए रूप में आना है।
ये जीवन चक्र है,चलताही रहेगा,
जोपृथ्वी पर आया, वहकिसी न किसी
प्रियकी मृत्यु
कादुख,दर्द जरूर सहेगा ।
किसीका भाई,जाएगातो किसी का बेटा,
किसीकी पत्नी विदा होगी तो किसीका प्रेमी।
औरफिर किसी -किसीके यहां
बेटाआएगा तो किसी का भाई।
कहींरोना होगा तो कहीं गाना्,
कहींमातम होंगे तो कही खुशी।
यहीतो है जीवन चक्र ,
समयका पहिंया।
आजवह गए हैं,कलकोई और जाएगा,
किसीन किसी दिन तुम्हारा
औरहमारा नंबर भी आएगा।
सबकेनंबर लगे हैं,
डेटफिक्स है,
किसीकी फोर है,
तोकिसी की सिक्स है।
यहकर्म भूमि है,
जिसकाजबतक कर्म बकाया है,
तबतक हर हाल में रहना है।
जीतेजी नई खुशी पर आनन्द मनानाहै,
हरप्रिय के जाने का दुख उठानाहै।
रावणबध के बाद राम को राज नहीं करनाथा,
कार्यसमाप्ति पर वापिस जाना था,
महाभारत का कार्य निपटाकर
कृष्णको भी प्राण गवांना था।
यहांसब कुछ एक क्रम में बंधा है,नियतिनिश्चित है,
कामसमय निर्धारित हैं।
क्रमतै हैँ।
समयचक्र जारी है,
हांपति के निधन की पीड़ा
तुमपर जरूर भारी है।
परजीवन चक्र चलता रहता है,
किसीके खो जाने से नहीं रूकता।
कोई भी पूर्ण जीवन साथ नहींचलता।
येट्रेन का सफर हो।
कोईकुछ देर बाद
अपनीयात्रा पूरी कर ट्रेन से उतरजाता है।
कोई गंतव्य तक हमारे साथ जाताहै।
पूरेसमय कोई साथ नहीं देता,
कोईहर वक्त ,हरपल साथ नहीं रहता।
अंधेरेमें हमारी छाया भी
हमारासाथ छोड़ देती है।
जीवनपथ में रोज साथी मिलते हैं,
रोजमौत उन्हें हर लेती है।
जोहुआ,उसेबिसराओ,
आओकुछ नया करने
नएमित्र बनाओ।
यहांजो तुम्हारा कार्य
शेषहै,उसेपहचानो।
जीवनजीने के लिए
नए संकल्प ठानो।
दुखदस्वपन भूलो,
मित्रसमझो,जगजाओ,
तुम्हेंअपने परिवार
मित्रोंके लिए जीना है,
जीवनमें पान करने को
जानेअभी कितना विष शेष है,
जानेकितना और
हलाहलपीना है।
अपनेशेष कार्य करने पर लग जाओ,
मित्र,
जगजाओ।
एकअंगडाई लो सुस्ती त्यागो,
नयाकार्य करने को
पूरीताकत से लग जाओ |
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चलिएचलिए रिश्तों को निभाने चलिए।
चलिएचलिए कॉलेज में पुराने चलिए।
जीवनको गुनगुनाए एक युग बीत गया,
पार्कमें बैठने,कुछसुनने -सुनानेचलिए।
चलोफूलों की क्यारी के सिरहानेबैठे,
चटकफूलों की खुशबू में नहानेचलिए।
जिंदगीने फुर्सत,नतुम्हे दी ,नमुझे दी,
आजफुर्सत है,एकगीत सुनाने चलिए।
सफर में कैसे -कौन मिलते हैं ?
ये कभी ,देखे नहीं जाते।
जिद गर जीने की हो,
तो पाँव के छाले
देखे नहीं जाते।
भूख हो, सामने हो रोटी, मीत!
हाथ गंदे काले देखे नहीं जाते।
तेज प्यास हो,सामने हो दरिया तो,
गिलास -प्याले देखे नहीं जाते
-दुनिया को चांदनी बांटने
वाले,
क्या मजबूरी है तेरी?
क्यों पूरी रात भटकता है,क्यों दुनिया रोशन करता है
-फूलों पर हैं शबनमी कतरे,
चांदनी क्या पूरी रात रोई है?
हवा कुछ गुनगुनी सी निकली है,
भोर में थक के रैन सोई है।
- भोर की पहली किरन सी ,
आ गयी हो तुम।
गुलमोहर पर लालिमा सी ,
छा गयी हो तुम।
फूल सारे खिल उठे हैं ,मन
-चमन के।
कौन सा रस -राग ,गुनगुना गयी हो तुम?
सूरज की किरन भी गजब कर गयी।
एक पल में ही चांदनी घर गयी।
रात भर पाँखुरी पर संवरती रही।
रोशनी पाते ही ओस खुद झर गयी।
-कौन सपने में गुदगुदा गया आकर?
तन का रोम- रोम नाच गया।
कैसी सनसनाहट हवाओं में है?
कौन वेदों की ऋचा सी बांच गया
·
हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी नेअपने स्वास्थ्य
का राज बताया-कि वह 10-20 किलो गाली रोजखातें हैं।इसी को लेकर नीचे
किया प्रयोग--/
घर के आंगन में उतरा ,
एक टन बादल का टुकड़ा।
उससे आई एक किलो धूल ,
पांच किलो बारिश।
आँगन में फैल गई ,आधा मीटर कीचड़।
कीचड़ में एक फिट पाँव फिसला।
तीन मीटर तक रपटे।
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जीवन है अनबूझ पहेली,
इसके मैं हल ढूॅढ रहा हूँ
वो भी मुझमें खोज रही है,
,मैंभी उसमे ढूॅढ रहा हूँ
।
चले कहाँ से,मंजिल क्या है?
इसका कुछ भी पता नही है,
समय बड़ा बलवान है हमसे,
किसी और की खता नहीं है।
हम जो चाहेंसब हो जाए,
ऐसा कभी नहीं होता है,
जीवन तो है नदिया जैसा,
जो पाया सब ही खोता है।
अपना कोई अस्तित्व नहीं है,
दरिया की छोटी बूॅद रहा हूँ।
वो भी मुझमें खोज रही
है------
सदियों से चलता आया है,
किस्सा वही पुराना यारों।
जितनी हो सके मदद करो तुम,
जिसको चाहो पार उतारो।
कुछ अच्छा बाॅटोगे तो,
अच्छा ही सब पाओगे।
अच्छे कर्मों से ही अपना
भी परलोक बनाओगे।
मान सको तो मान लो इतना,
अब मैं आंखे मूॅद रहा हूँ।
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